Sunday, 29 October 2017

♥♥तुम ही तुम ...♥♥

♥♥♥♥♥♥♥♥तुम ही तुम ...♥♥♥♥♥♥♥♥ 


तुम परिचायक मेरी प्रीत की। 
धुरी तुम्ही हो मेरी जीत की। 
तुम शीतलता गरम धूप में,
तुम ऊष्मा हो जटिल शीत की। 

तुम उत्कृष्ट मेरे जीवन में, नेह, बोध, ममता तुममें है। 
तुम कर दोगी तिमिर को उजला, ये पावन क्षमता तुममें है। 
तुम्ही वंदना, तुम्ही प्रार्थना, तुम्ही हमारी मनोकामना। 
तुम्ही निवेदन, अधिकार तुम, तुम्ही हमारी क्षमा याचना। 

तुम भावुकता हो शब्दों की,
तुम ही लय हो मेरे गीत की। 
तुम शीतलता ग्रीष्म काल में,
तुम ऊष्मा हो जटिल शीत की...


तुम गंगा जल, तुम ही बल हो, तुम शक्ति हो, तुम ज्योति हो। 
किरन हर्ष की फूटें मन में, निकट मेरे जब तुम होती हो। 
तुम हरियाली हो उपवन की, तुम्ही फूल हो, तुम्ही रंग हो। 
मेरा जीवन बने सुगन्धित, सखी यदि तुम मेरे संग हो। 

तुम जाग्रति मानवता की,
तुम रूपक हो सबल रीत की।  
तुम शीतलता गरम धूप में,
तुम ऊष्मा हो जटिल शीत की...

तुम्ही प्रेयसी, तुम्ही नायिका, तुम्ही धरोहर, तुम सहजन हो। 
तुम्ही "देव" सी कलाकृति हो, तुम नैसर्गिक आलेखन हो। 
तुम अभिनन्दन, तुम आकर्षण, तुम संग्रह हो, तुम्ही कोष हो। 
तुम पर्याय प्रेम ऋतुओं का, तुम्ही लेखनी, काव्य कोश हो। 

तुम सतरंगी इंद्रधनुष की,
तुम यौवनता मेरे मीत की।  
 तुम शीतलता गरम धूप में,
तुम ऊष्मा हो जटिल शीत की। "

"
कोई ऐसा मनुज जिसका होना हमारे जीवन में, हमारी आत्मा को पूर्ण करता है, तब निश्चित प्रेम की कलियाँ पुष्प बनकर समूचे जग को मानवीयता से सुगन्धित करती हैं, तो आइये ऐसे श्रेष्ठ जान का वंदन करें। ....."

चेतन रामकिशन "देव"
दिनांक-२९.१०.२०१७ 

(मेरी यह रचना मेरे ब्लॉग पर पूर्व प्रकाशित, सर्वाधिकार सुरक्षित )


  



Tuesday, 10 October 2017

♥♥♥♥♥♥प्यार की बयार...♥♥♥♥♥♥♥

♥♥♥♥♥♥प्यार की बयार...♥♥♥♥♥♥♥
प्यार की जब बयार होने लगी।
जिंदगी खुशगवार होने लगी।

चांद बनकर के तुम मिले जो मुझे,
चांदनी बेशुमार होने लगी।

तेरी पाकीज़गी भरी सीरत,
हर तपिश दरकिनार होने लगी।

तेरी छुअन से मिट गया पतझड़,
हर तरफ ही बहार होने लगी।

रात का ख्वाब, तू सुनहरी किरन,
रौशनी रूह के पार होने लगी।

दिल तो पागल है तेरी चाहत में,
जान तक भी निसार होने लगी। 

" देव " तुझसे ही मेरा अर्थ यहाँ,
तू ही जीवन का सार होने लगी। "  

......चेतन रामकिशन "देव"……

Friday, 22 September 2017

♥♥घातक...♥♥♥




♥♥♥♥♥♥♥घातक...♥♥♥♥♥♥♥♥
विस्फोटक की संज्ञा देकर, मुझको घातक सिद्ध कर दिया। 
मुझको खलनायक सा आखिर क्यों करके प्रसिद्द कर दिया। 
क्या अपने अधिकार के स्वर को, गुंजित करना यहाँ गलत है,
दीवारों पे अपराधी लिख, क्यों मुझको संलिब्ध कर दिया। 

ये तो घोर दमन के क्षण हैं, अभिव्यक्ति मारी जाती है। 
नायक की युद्धक क्षमता भी, देखो बेकारी जाती है। 
शत्रु, भ्रष्टाचारी, लोभी को मिलता सम्मान यहाँ पर,
हत्यारे तो विजयी हो रहे, मानवता हारी जाती है। 

निर्दोषी जीवन गतियों को, जबरन क्यों अवरुद्ध कर दिया।  
विस्फोटक की संज्ञा देकर, मुझको घातक सिद्ध कर दिया। 

क्यों आखिर दुष चलन हो रहा, क्या सज्जनता अभिशापी है। 
क्या मिथ्या है पुण्य का बिंदु, क्या पूजन हेतु पापी है।
खंडित किया जा रहे सपने, ताकत का प्रभाव बनाकर,
जाति, हिंसा, लूट मार की, चंहुओर आपाधापी है। 

गंगा सा पावन होकर भी, रेखांकन संदिग्ध कर दिया। 
विस्फोटक की संज्ञा देकर, मुझको घातक सिद्ध कर दिया।

अब अपनायत किससे रखें, किससे मन की पीर बताएं। 
लोग यहाँ पर अम्ल छिड़ककर, हँसते चेहरों को झुलसाएं। 
" देव " तपस्या कितनी कर लो, कितना कर लो करुण निवेदन,
हत्यारे हैं, कमजोरों के जीवित तन में आग लगाएं। 

अब चुप हूँ पर शत्रु मर्दन, करूँगा जिस दिन युद्ध कर दिया।   
विस्फोटक की संज्ञा देकर, मुझको घातक सिद्ध कर दिया। "

......चेतन रामकिशन "देव"……
दिनांक- 22 09 2017
(मेरी यह रचना मेरे ब्लॉग पर पूर्व प्रकाशित, सर्वाधिकार सुरक्षित )

Monday, 18 September 2017

♥♥जड़वत...♥♥

♥♥♥♥♥♥♥♥जड़वत...♥♥♥♥♥♥♥♥
सजल नयन हैं, तुम बिन पीड़ा, जड़वत मेरी गति हो गई। 
हृदय टूटकर बिखरा पथ पर, तुम बिन गहरी क्षति हो गई। 
तन, मस्तक सब केश, कंठ भी विरह भाव से प्रभावित हैं,
तुम बिन मन को कुछ न भाये, तुमको अर्पित मति हो गई। 

खाई थी सौगंध जन्म की, किन्तु नाता तोड़ रहे हैं। 
अपने स्वजन बुरे समय में, मुझसे मुख को मोड़ रहे हैं,
मैं एकाकी शिशु की भांति, बोध नहीं है युद्ध कला का,
निर्मोही होकर के मुझको, अग्निपथ में छोड़ रहे हैं। 

मुझको एकदम किया बहिष्कृत, तृप्त जो उनकी रति हो गई। 
सजल नयन हैं, तुम बिन पीड़ा, जड़वत मेरी गति हो गई ...

होकर के निर्दोष भी मुझको, क्यों कर कारावास दिया है। 
न ही सौंपी हर्ष की धरती, न सुख का आकाश दिया है। 
तुमने अपने महल दुमहले चमकाए हैं उजले पन में,
किन्तु सक्षम होकर तुमने, न मुझको प्रकाश दिया है। 

 देखो मेरी अनुभूति की, न चाहकर भी यति हो गई।  
सजल नयन हैं, तुम बिन पीड़ा, जड़वत मेरी गति हो गई.... 

लगता है बारूद भरा है, मेरे मन की दीवारों में। 
स्याह हो गया जीवन पूरा, भय लगता है उजियारों में। 
" देव " ये कैसी परिपाटी है, कैसा मन का उत्पीड़न है,
अब सावन में पतझड़ लगता, नहीं लगन अब श्रंगारों में।  

मेरी आत्मा प्रतीक्षा के अंगारों में सती हो गई। 
सजल नयन हैं, तुम बिन पीड़ा, जड़वत मेरी गति हो गई। "


......चेतन रामकिशन "देव"……
दिनांक- १८.०९.२०१७ 


Wednesday, 9 August 2017

♥♥♥♥वार...♥♥♥♥♥♥

♥♥♥♥वार...♥♥♥♥♥♥
तबाह हो न सके हम, तो हमें मार दिया। 
मोहब्बत ईश्क़ का रिश्ता भी दरकिनार किया। 

जंग होती जो सामने से, हम भी लड़ लेते,
मगर उस शख़्स ने, पीछे से हमपे वार किया। 

सुनो अब टूट गयी, हर कड़ी वफाओं की,
जुर्म उसका था मगर, मुझको गुनहगार किया। 

उदास रात है, रिसते हुए खूं की टपकन, 
तीर कसकर के मेरे दिल के आरपार किया। 

' देव' उम्मीद है, शायद सुकून मिल जाए,
आग का दरिया तो हंसकर के हमने पार किया। "


.....चेतन रामकिशन "देव"……
दिनांक- ०९.०८.२०१७ 





Saturday, 29 July 2017

♥अश्रु जल...♥

♥♥♥♥अश्रु जल...♥♥♥♥♥♥
ह्रदयाघात, प्रताड़ित मन है ,
अब तो शूलों पे जीवन है,
कष्ट आत्मा तक आ पहुंचा,
अश्रु जल का बहिर्गमन है। 

मुख झुलसा है, पांव में छाले, धूप जलाती है भादों की। 
मौन हैं मेरी आह को सुनकर, घनी रिक्तता संवादों की,
परिलक्षित हो ही जाता है, जब मन के मंतव्य बदलते,
सच के सम्मुख चमक बढ़ रही, मिथ्या के कुछ उत्पादों की। 

आरोपित करके खुश होना,
अधिकांशत यही चलन है। 
कष्ट आत्मा तक आ पहुंचा,
अश्रु जल का बहिर्गमन है ...

बिखर रहे सब स्वप्न नयन के, जटिल अवस्था है जीवन की। 
शब्द रो रहे दशा देखकर, व्याकुलता इतनी लेखन की। 
हर्षित हैं वो मुझे रुलाकर, विस्मृत करके संबंधों को,
नहीं टीस सुनता है कोई, मन के व्याकुल उद्बोधन की। 

उमड़ रहा पीड़ा का सागर,
मानवता का बड़ा दमन है। 
कष्ट आत्मा तक आ पहुंचा,
अश्रु जल का बहिर्गमन है। "


......चेतन रामकिशन "देव"……
दिनांक- २९.०७.२०१७ 

Thursday, 15 June 2017

♥♥♥♥सियासी...♥♥♥♥♥♥

♥♥♥♥सियासी...♥♥♥♥♥♥
झूठे सब्जबाग दिखलाकर। 
जात धर्म का पाठ पढ़ाकर। 
आज सियासी खुश होते हैं,
औरों के घर आग लगाकर। 

मुफ़लिस की एक ईंट ईंट तक,
झोपड़ पट्टी बिक जाती है। 
बची खुची बस जान जिस्म की,
मरकर पथ में फिंक जाती है। 

घर, बस्ती और गलियारों में,
नफरत की दिवार उठाकर।
आज सियासी खुश होते हैं,
औरों के घर आग लगाकर। 

व्याकुल बेरोजगार सिसकते,
कहीं पे चूल्हे नहीं दहकते,
कहीं नहीं है छत की छाँव,
भूख से बच्चे नहीं चहकते। 

सेंक रहे मतलब की रोटी,
मज़लूमों की लाश तपाकर।
आज सियासी खुश होते हैं,
औरों के घर आग लगाकर। "


......चेतन रामकिशन "देव"……
दिनांक- १६-०६-२०१७